रविवार, जून 14, 2009

बुंदों का रोमांच - मंदार चोळकर

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पार इस बारिश के है
सखी तेरा डेरा
कडकती है बिजली और
धडकाती है मन मेरा
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चेहरे की मधुरिमा
अाईने पार छाई
फूल बालों में सजाया
जिन्दगी महकाई
घाव काजल का लगे
पलकों पे कितना प्यार
पार इस बारिश के है
सखी तेरा डेरा
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थाम लो अब अाह को
अाँसूओं थम जाओ
ना रे ना रे ना सखी
ऐसे भी मुरझाओ
गीत मनका मुस्कुराए
होठों पर अब मेरा
पार इस बारिश के है
सखी तेरा डेरा
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हाथों पर मुसकाए ओले
हरियाली छाए
बुंदों का रोमांच मेरे
हाथों पर उग अाए
भीगा भीगा अाँसमा
हाथों में भर लो सारा
पार इस बारिश के है
सखी तेरा डेरा
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मूल मराठी कविता: थेंबांचा शहारा
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपूर
यू ट्यूब कडी: http://www.youtube.com/watch?v=XWE32rw185A
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सोमवार, अक्‍तूबर 27, 2008

दूर देस गए बाबूजी - संदीप खरे

दूर देस गए बाबूजी
गई काम के लिये माँ
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

मेरी छोटी नन्ही सी जाँ
कैसे संजोके रखी है
यूँही अकेले खेल के
थक हार ये गयी है
बस करो सो जाओ बेटे
कोई कहता भी है ना
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

पता नहीं क्यों भला
स्कूल में होती है छुट्टी
बात करता ना कोई
कैसे होगी कट्टी बट्टी
खेल रक्खे है सजाकर
कोई खेलता भी है ना
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

खिडकी से देखने से
जग सारा दिखता है
दरवाजा लांघ के पर
वहाँ दौडना नहीं है
कैसे जाऊँ हाथों में
कोई उंगली भी है ना
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

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मूल गीत: दूर देशी गेला बाबा
कवी: संदीप खरे
गायक: सलील कुलकर्णी
अल्बम: अगोबाई ढग्गोबाई
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपूर


रविवार, अक्‍तूबर 26, 2008

नामंजूर - संदीप खरे

सम्हल सम्हल के नाँव चलाना नामंजूर
मुझे हवा की राह देखना नामंजूर
तय करता मैं दिशा भी बहते पानी की
मौज हिलाए जैसे, हिलना नामंजूर

नहीं चाहिये मौसम की सौगात मुझे
नहीं चाहिये शुभ शकुनों का साथ मुझे
मन करता हो वही महुरत है मेरा
मौका देख के खेल खेलना नामंजूर

अपने हाथों अपनी मौत मै मरता हूँ
मोह के लिये देह भी गिरवी रखता हूँ
खूबसूरती देख जिंदगी है कुरबान
अबरू का बेतुका बहाना नामंजूर

झगडा वगडा और मनाना है हरदम
तेरा मेरा हिसाब रखना है हरदम
जमा खर्च यहीं लेता हूँ देता हूँ
आसमान से चुगली करना नामंजूर

मनकी करने को शाप ना माना मैने
उपभोग को कभी पाप ना माना मैने
काले बादल जिससे गुजरे ना हो
आसमान वो कभी देखा ना मैने

गणीत नीती का मुझसे तो रक्खो दूर
रगों में बहता खून असली जीवन का नूर
खून बहाकर जीते रहना मुझे पता
अपने खून का गरूर करना नामंजूर

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मूल कविता: नामंजूर
कवी: संदीप खरे
अल्बम: नामंजूर
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपूर

शनिवार, मार्च 08, 2008

पगलाया (वेड लागलं) - संदीप खरे

झोंके में झलक गई, क्या अदाएँ रख गई
आसमाँ कि गहराई अखियोंमें दिख गई
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

काली काली अखियोंने बेकरार किया
उसको ही ढुंढता है बार बार जिया
देखकर चाँद मौज खाए हिचकोले
रात भर पडतें है कविता के ओले
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

पेड हरा भरा पत्ता पत्ता हिल गया
जमीं और आसमाँ का फर्क भूल गया
जैसे कोई पंछी बिजली को चाहता हो
उसे कसे आओ घोसले में सो जाओ
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

चांदनी रात पे जब आजाए जवानी
खाली खाली घर सुने मेरी ये कहानी
देखता हूँ कहता हूँ ऐसे चलता हूँ
हवाओं पे अपनी निशानी छोडता हूँ
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

बौराया घर मुहल्ला बौराया
चैन खुशी अपनी मैं खुद काट खाया
बढ रही आग अब धधकती जाए
जहर है फिर भी दिल उसे माँगता है
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

जानता हूँ सपना है चाहत तुम्हारी
छलके है दिवानगी आँखों से ही मेरी
मेरी बात छोडो यारों मै तो बावला हूँ
कफन में लिपट के खुद ही बैठा हूँ
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

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मराठी कविता: वेड लागलं
अल्बम: आयुष्यावर बोलू काही
कवि: संदीप खरे
अनुवाद: तुषार जोशी, नागपूर

शुक्रवार, मार्च 07, 2008

तुम छोड गये, जरूरत थी ज्यादा जब हमको - रेंडी वनवार्मर

रेंडी वनवार्मर , अपने "Just when I needed you most" इस गीत के लिये सालों तक चर्चा में रहें। वो गीत यूट्यूब पर जगह जगह सुनने के लिये उपलब्ध है। आज उस गीत का अनुवाद प्रस्तुत है।

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चल दिये सुबहा तुम,
देखते रह गए हम,
क्या कहे सोचते रहे
चल दिये बारिश में तुम,
दरवाजा खोल कर
हम तुमको रोक ना पाये

अब याद आ रहे हो तुम,
पहले से ज्यादा हमको
कैसे अब चैन आए, बोलो तो
तुम..... छोड गये
जरुरत थी ज्यादा जब हमको

हर सुबहा फिरसे हम
सोचते है तुम को
खोजने कहाँ को जाए
खत लिखे कितने ही भेजना हम चाहें
बस एक खत तो आए

अब याद आ रहे हो तुम,
पहले से ज्यादा हमको
कैसे अब चैन आए, बोलो तो
तुम..... छोड गये
जरुरत थी ज्यादा जब हमको

चल दिये सुबहा तुम,
देखते रह गए हम,
क्या कहे सोचते रहे
चल दिये बारिश में तुम,
दरवाजा खोल कर
हम तुमको रोक ना पाये

अब याद आ रहे हो तुम,
पहले से ज्यादा हमको
कैसे अब चैन आए, बोलो तो
तुम..... छोड गये
जरुरत थी ज्यादा जब हमको

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मूल गीत: रेंडी वनवार्मर
हिन्दी अनुवाद: तुषार जोशी, नागपूर

गुरुवार, मार्च 06, 2008

घिर आयी बदरा - शिल्पा देशपांडे

घिर आयी बदरा झोंका कानों में बताए
देखो बारिश दिवानी जाने तेरी भावनाएँ

लडी छुई सी मुई सी पत्तो पत्तों से लिपटे
गिली मेहंदी की पायल बदन में यूँ खनके
चाँद हुआ है दिवाना चाहे बादलोंकी बाहें
देखो बारिश दिवानी जाने तेरी भावनाएँ

आँसमां की बेकरारी बढ गई है कितनी
बुंदों से लद गई है सज गई है ये जमीं
साँसे महकाए बुदो का संगीत सुनाए
देखो बारिश दिवानी जाने तेरी भावनाएँ

घिर आयी बदरा झोंका कानों में बताए
देखो बारिश दिवानी जाने तेरी भावनाएँ

मराठी गीत: शिल्पा देशपांडे
हिन्दी अनुवाद: तुषार जोशी, नागपूर

जाते जाते कह गई वो - तुषार जोशी

तुषार जोशी, नागपूर की मराठी कविता "ती जातांना हळूच म्हणाली" का हिन्दी अनुवाद. आप इस मराठी गीत को सुबोध की आवाज़ मे यहाँ सुन सकते हैं

जाते जाते कह गई वो
मुझे भुला दोगे क्या?
भर आया था गला अचानक
वक्त थम सा गया था

अनजाने में रिश्ते बन गए
जैसे फूल और खुशबू
चढ रहा था धीरे धीरे
बाली उमर का जादू
कहने लगी ना याद दिलाओ
फिरसे रुलाओगे क्या?

जाते जाते कह गई वो
मुझे भुला दोगे क्या?
भर आया था गला अचानक
वक्त थम सा गया था

किसमत से हम झुझते रहे
हारे ना घबराये
टिके रहे हम जाने कितने
आँधी तुफाँ आये
किस्मत ने पर अंगारों से
दामन भर दिया था

जाते जाते कह गई वो
मुझे भुला दोगे क्या?
भर आया था गला अचानक
वक्त थम सा गया था

तुषार जोशी, नागपूर

गुरुवार, सितंबर 13, 2007

तेरा मेरा नाता है क्या - संदीप खरे

तेरा मेरा नाता है क्या?
तुम देती हो... मै लेता हूँ
तुम लेती हो... मै देता हूँ
घडी घडी में रूप है बदलता
समय का पहिया सदा है चलता
हम दोनो में फर्क है कैसा
आपस में एक जैसा है क्या?

मुझे पता है उसे निन्द न आई होगी
सपने चल रहें होंगे आँखो में
करवट बदलेगी.. तनहाई होगी
मुझे पता है उसे निन्द न आई होगी
उसके सामने वही बादल.. जो मेरे सामने
उसके सामने हवी कोहरा.. जो मेरे सामने
उसके मेरे अर्धविराम भी वही, पूर्णविराम भी
तभी तो मै जब यहाँ बेचैन हूँ
उसकी पलकें भी ना झपकी होंगी
मुझे पता है उसे निन्द न आई होगी

सुखदुख बरसे हम पर जब भी
हँस दिये कभी रो लिये हम भी
राहें अपनी संग चलतीं है
जब चाहे नजरे मिलती है
ये किस जनम से लेकर चलें है
ये रिश्तों का राज है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?

बागिचे लगायें है हमने इकठ्ठा
माटी में खेले है एक साथ
बालों में माटी है हमारे अब भी
दिल में सितारें है हमारे अब भी
दोंनों के हाथों पर एक दुजे जी रेखाएँ है
दोनों के दिल में एक दुजें की अदाएँ है
रात जब चाँदनी में भीग जायेगी, और मै बेनीन्द
तब बरफ की चादर के निचे बहती हो नदी
उस तरह हो बेनीन्द होगी
मुझे पता है उसे निन्द न आई होगी

ना रिश्ते को हो कोई नाम
दिल से मिलना दिल का काम
अलग अलग है सफर हमारे
फिर भी एक दुजे के है सहारे
जब भी मुझको काँटा चुभता है
तेरे दिल में ये दर्द है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?

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कवि: संदीप खरे
मूल गायक: संदीप खरे
भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपुर