सोमवार, अक्तूबर 27, 2008

दूर देस गए बाबूजी - संदीप खरे

दूर देस गए बाबूजी
गई काम के लिये माँ
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

मेरी छोटी नन्ही सी जाँ
कैसे संजोके रखी है
यूँही अकेले खेल के
थक हार ये गयी है
बस करो सो जाओ बेटे
कोई कहता भी है ना
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

पता नहीं क्यों भला
स्कूल में होती है छुट्टी
बात करता ना कोई
कैसे होगी कट्टी बट्टी
खेल रक्खे है सजाकर
कोई खेलता भी है ना
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

खिडकी से देखने से
जग सारा दिखता है
दरवाजा लांघ के पर
वहाँ दौडना नहीं है
कैसे जाऊँ हाथों में
कोई उंगली भी है ना
भारी निंद से हैं आँखे
मगर घर में कोई ना

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मूल गीत: दूर देशी गेला बाबा
कवी: संदीप खरे
गायक: सलील कुलकर्णी
अल्बम: अगोबाई ढग्गोबाई
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपूर


4 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक रचना ।
    आपको व आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं ।
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपको दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें।
    अभी अपना व्यावसायिक हिन्दी ब्लॉग बनायें।

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  3. बहुत भावपूर्ण..


    आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

    उत्तर देंहटाएं

आपने यह अनुवाद पढा इसलिये आपका बहोत बहोत आभारी हूँ। आपको यह प्रयास कैसा लगा मुझे बताईये। अपना बहुमुल्य अभिप्राय यहाँ लिख जाईये। अगर आप मराठी जानते हैं और आप इस कविता का मराठी रूप सुन चुकें है तब आप ये भी बता सकतें है के मै कितना अर्थ के निकट पहुँच पाया हूँ। आपका सुझाव मुझे अधिक उत्साह प्रदान करेगा।