शनिवार, मार्च 08, 2008

पगलाया (वेड लागलं) - संदीप खरे

झोंके में झलक गई, क्या अदाएँ रख गई
आसमाँ कि गहराई अखियोंमें दिख गई
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

काली काली अखियोंने बेकरार किया
उसको ही ढुंढता है बार बार जिया
देखकर चाँद मौज खाए हिचकोले
रात भर पडतें है कविता के ओले
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

पेड हरा भरा पत्ता पत्ता हिल गया
जमीं और आसमाँ का फर्क भूल गया
जैसे कोई पंछी बिजली को चाहता हो
उसे कसे आओ घोसले में सो जाओ
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

चांदनी रात पे जब आजाए जवानी
खाली खाली घर सुने मेरी ये कहानी
देखता हूँ कहता हूँ ऐसे चलता हूँ
हवाओं पे अपनी निशानी छोडता हूँ
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

बौराया घर मुहल्ला बौराया
चैन खुशी अपनी मैं खुद काट खाया
बढ रही आग अब धधकती जाए
जहर है फिर भी दिल उसे माँगता है
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

जानता हूँ सपना है चाहत तुम्हारी
छलके है दिवानगी आँखों से ही मेरी
मेरी बात छोडो यारों मै तो बावला हूँ
कफन में लिपट के खुद ही बैठा हूँ
अब
पगलाया, पगलाया मैं, पगलाया मैं, पगलाया

-------------------------------------

मराठी कविता: वेड लागलं
अल्बम: आयुष्यावर बोलू काही
कवि: संदीप खरे
अनुवाद: तुषार जोशी, नागपूर

1 टिप्पणी:

  1. Thank you for the wonderful translation of yet another of Sandeep Khare's songs. Could I make a humble request for you to translate the lyrics of Namanjur title song as well? That would be just terrific!

    उत्तर देंहटाएं

आपने यह अनुवाद पढा इसलिये आपका बहोत बहोत आभारी हूँ। आपको यह प्रयास कैसा लगा मुझे बताईये। अपना बहुमुल्य अभिप्राय यहाँ लिख जाईये। अगर आप मराठी जानते हैं और आप इस कविता का मराठी रूप सुन चुकें है तब आप ये भी बता सकतें है के मै कितना अर्थ के निकट पहुँच पाया हूँ। आपका सुझाव मुझे अधिक उत्साह प्रदान करेगा।