प्रसन्न शेंबेकर मेरे कवि मित्र हैं। उनकी ये पंक्तियाँ हमेशा मेरा उत्साह वर्धन करती रहती हैं।
मैं ये आँधी झेल जाउंगा
ऐसा आत्मविश्वास है।
पाँव के निचे मेरी जमीँ
और ये मेरा आकाश है।
पाँव गडाकर मेरा निश्चय
सह्याद्रि सा नीडर है।
आओ आँधीयों आज तुम्हारी
पर्वत के संग टक्कर है।
कवि - प्रसन्न शेंबेकर, नागपुर
अनुवाद - तुषार जोशी, नागपुर
गुरुवार, जनवरी 25, 2007
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1 टिप्पणियाँ:
सुंदर कविता एवं अनुवाद.
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