बुधवार, नवंबर 22, 2006

आजाओ मन बसमें नही अब मेरा - प्रसन्न शेंबेकर

आजाओ मन बसमें नही अब मेरा
तेरी यांदो ने है मुझको घेरा

सांझ ढ़ले जब नदी किनारे
जो पल हमने साथ गुज़ारे
कुछ ना बाकी पास हमारे
सूना घर है सूना आज बसेरा
तेरी यांदो ने है मुझको घेरा

हाथों में हाथों को डारे
आँखो से होते थे इशारे
आज नही तुम संग हमारे
आसपास साया लगता है तेरा
तेरी यांदो ने है मुझको घेरा

उलझी लट गालों पर प्यारी
पवन के झोंके ने है सँवारी
मधुर सावलीं छवी तुम्हारी
आँख मुद कर याद करूँ वो चेहरा
तेरी यांदो ने है मुझको घेरा



मूल कविता: प्रसन्न शेंबेकर, नागपूर
अनुवाद: तुषार जोशी, नागपूर

अनुप जी, मै इन मराठी कवियों का संक्षिप्त परिचय यहा लिखने का प्रयास करुंगा। सुझाव के लिये धन्यवाद।

4 टिप्‍पणियां:

  1. अनुवाद इतना सुन्दर हुआ है कि लगता ही नहीं कविता अनुवादित है.

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  2. बेनामी4:54 pm

    स्वागत है हिन्दी चिट्ठे जगत में

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  3. किसी भी कविता के अनुवाद में भाव और प्रवाह दोनों का निर्वाह करना आसान नहीं है ।
    आप इन दोनों में सफ़ल हुए हैं।

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  4. तुषार,

    हिन्दी चिट्ठा जगत् में आपका स्वागत है.

    मराठी में व्यंग्य बहुत ही सशक्त और समृद्ध है. हम उन्हें भी पढ़ना चाहेंगे. और खूब पढ़ना चाहेंगे. :)

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आपने यह अनुवाद पढा इसलिये आपका बहोत बहोत आभारी हूँ। आपको यह प्रयास कैसा लगा मुझे बताईये। अपना बहुमुल्य अभिप्राय यहाँ लिख जाईये। अगर आप मराठी जानते हैं और आप इस कविता का मराठी रूप सुन चुकें है तब आप ये भी बता सकतें है के मै कितना अर्थ के निकट पहुँच पाया हूँ। आपका सुझाव मुझे अधिक उत्साह प्रदान करेगा।