बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने
सिर्फ इतना है कि मैने तुमको देखा सामने
शोख इन गालों पे देखो छुप के आती लालियाँ
छुपके छुपके जब से मुझको तुम लगे हो देखने
बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने
कितनी कोमल फूल मेरे उम्र तेरी है अभी
रंग हो गए बोझ लगती पंखुडीयाँ है कापने
बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने
सब सितारे पा के भी नाराज रहता है गगन
इक सितारा जब भी धरती पर है दिखता सामने
बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने
देख तुझको गजरे के सब रंग उड गये है यहाँ
उसकी पीडा खुशबू बनकर अब लगी है फैलने
बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने
सुबह मैने तेरी फुलों से नज़र उतारली
जाने कितने लोग सपने में लगे है देखने
बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने
--------------------------------------------
कविता: मेघ नसता वीज नसता
कवि: संदीप खरे
भावानुवाद: तुषार जोशी नागपुर
--------------------------------------------
शनिवार, फ़रवरी 24, 2007
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें