मंगलवार, नवंबर 21, 2006

सौमित्र जी की एक कविता

सुमित्रा
तुम वहीं खडी रहो
पहले मैं जाउंगा
याने मै ही तुम्हारी ज़िंदगी से चला गया
ऐसा होगा

हमेशा
लोग ही मेरी ज़िंदगी से
क्यों जाए?

(३५, आणि तरीही मी, सौमित्र)

स्वैर अनुवाद: तुषार जोशी, नागपूर

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा प्रयास है । बधाई और शुभ कामनाएं ।

    यदि कविता के साथ साथ सन्दर्भ और कवि के बारे में जानकारी दे सकें तो शायद और अधिक आनन्द आये ।

    उत्तर देंहटाएं

आपने यह अनुवाद पढा इसलिये आपका बहोत बहोत आभारी हूँ। आपको यह प्रयास कैसा लगा मुझे बताईये। अपना बहुमुल्य अभिप्राय यहाँ लिख जाईये। अगर आप मराठी जानते हैं और आप इस कविता का मराठी रूप सुन चुकें है तब आप ये भी बता सकतें है के मै कितना अर्थ के निकट पहुँच पाया हूँ। आपका सुझाव मुझे अधिक उत्साह प्रदान करेगा।