"जो मुलत: अच्छा कवि होता है वही मराठी में दमदार गज़लें लिख सकता है, इस वास्तविकता का सबूत थे कविवर्य श्री सुरेश भट जी।" रुपगंधा सुरेश भट जी का पहला काव्यग्रंथ है। आज इसी काव्यग्रंथ से एक कविता का भावानुवाद प्रस्तुत है।
आज जा के
धिरे धिरे आ रहा है
मेरी पीडा को आकार
धिरे धिरे उठ रही है
निचीं नज़रें उपर
जैसे तीव्र होता जाए
मेरी यातना का घेरा
वैसे वैसे बढ़ता है
लढ़ने का बल मेरा
सह चुके कितने ही
मिथ्या स्वप्नों की उलझन
चार दानों को मानली
मैने दौलत महान
हो रहा है मुझसे मेरा
परिचय आज जा के
फूट रहे है गितों को
पंख मेरी यातना के
(आता मात्र, रुपगंधा, सुरेश भट)
मूल कविता: आता मात्र (मराठी)
काव्यग्रंथ: रुपगंधा
कवि: सुरेश भट
भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपुर
शनिवार, दिसंबर 02, 2006
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