बोलगाणी ईस काव्य ग्रन्थ में मंगेश पाडगावकर जी ने मराठी में सरल भाषा में अनेको प्यारी कविताओं को लिखा है। सांगा कसं जगायचं ये उनमें से ही एक कविता है। ईस कविता को आप यहाँ सुन सकतें है। अवश्य सुने।
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बोलो कैसे जीना है
रोते रोते
या गुनगुनाकर
आप बताओ
आँखों ही आँखों में आपकी
कोई बाट
जोहता है ना?
गरमा गरम खाना
कोई सलीके से
परोसता है ना?
जली कटी कहना है?
या दुआ देकर हसना है?
आप बताओ
बोलो कैसे जीना है
रोते रोते
या गुनगुनाकर
आप बताओ
भीषण अंधेरी
रात में जब
कुछ दिखाई नही देता है
आपके लिये
दीप लेकर
कोई जरूर खड़ा होता है
अंधेरे में चिढ़ना है?
या प्रकाश में उड़ना है?
आप बताओ
बोलो कैसे जीना है
रोते रोते
या गुनगुनाकर
आप बताओ
पाँव में काँटा
चूभता है
हा ये सच होता है
सुगंधित फूल
का खिलना
क्या सच नही होता है?
काँटों की तरह चूभना
या फुलों की तरह महकना?
आप बताओ
बोलो कैसे जीना है
रोते रोते
या गुनगुनाकर
आप बताओ
प्याला आधा
खाली है
ये भी कह सकते हो
प्याला आधा
भरा हुआ है
ये भी तो कह सकते हो
खाली है कहना है?
या भरा हुआ कहना है?
आप बताओ
बोलो कैसे जीना है
रोते रोते
या गुनगुनाकर
आप बताओ
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कवि- मंगेश पाडगावकर
काव्य संग्रह - बोलगाणी
मूल कविता - सांगा कसं जगायचं, कण्हत कण्हत की गाणं म्हणत, तुम्हीच ठरवा
भावानुवाद - तुषार जोशी, नागपुर
कुछ मराठी कविताएं जो पुनः पुनः पढने का मन करता है ऐसी कविताओं का हिंदी अनुवादकरने का ये एक प्रयास है।
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रविवार, फ़रवरी 18, 2007
रविवार, फ़रवरी 11, 2007
घडीबाबा - कुसुमाग्रज
कविवर्य "कुसुमाग्रज" मराठी के जाने माने कवि हैं। बचपन में पाठ्यक्रम में हमें उनकी एक कविता हुआ करती थी। उस कविता कि स्मृति आज तक मन में ताज़ा है। "घड्याळबाबा" नामक उस कविता को सुनकर मन में अनेक सुखद क्षण उमड आते हैं। आज उस कविता का भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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घडीबाबा दिवाल पर बैठते हैं
दिन भर टिक - टिक करते हैं
ठन ठन ठोका देते हैं
और कहते हैं -
बच्चों, छै बज गए
अब उठो,
बच्चों, आठ बज गए
अब नहाओ।
बच्चों, दस बज गए
अब खाना खाओ।
ग्यारह बज गए, स्कूल जाओ।
हम रोज घडीबाबा कि सुनते हैं।
पर इतवार को एक नहीं सुनते।
वो कहते है, छै बज गए, उठो,
हम सात बजे उठते हैं।
वो कहते हैं, आठ बज गए, नहाओ,
हम नौ बजे नहाते हैं।
वो कहते हैं, दस बज गए, खाना खाओ,
हम ग्यारह बजे खातें हैं।
और इतवार को स्कूल कि
तो छुट्टी होती है।
फिर घडीबाबा खूब गुस्सा करते हैं
जोर जोर से टिक टिक करते हैं
गुस्से से ठन ठन ठोके लगाते हैं
पर इतवार को हम उनकी तरफ
देखते भी नहीं।
देखा भी तो सिर्फ हँसते हैं
और खेलते रहते हैं।
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मूल कविता: घड्याळबाबा
मूल कवि: कुसुमाग्रज
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपुर
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घडीबाबा दिवाल पर बैठते हैं
दिन भर टिक - टिक करते हैं
ठन ठन ठोका देते हैं
और कहते हैं -
बच्चों, छै बज गए
अब उठो,
बच्चों, आठ बज गए
अब नहाओ।
बच्चों, दस बज गए
अब खाना खाओ।
ग्यारह बज गए, स्कूल जाओ।
हम रोज घडीबाबा कि सुनते हैं।
पर इतवार को एक नहीं सुनते।
वो कहते है, छै बज गए, उठो,
हम सात बजे उठते हैं।
वो कहते हैं, आठ बज गए, नहाओ,
हम नौ बजे नहाते हैं।
वो कहते हैं, दस बज गए, खाना खाओ,
हम ग्यारह बजे खातें हैं।
और इतवार को स्कूल कि
तो छुट्टी होती है।
फिर घडीबाबा खूब गुस्सा करते हैं
जोर जोर से टिक टिक करते हैं
गुस्से से ठन ठन ठोके लगाते हैं
पर इतवार को हम उनकी तरफ
देखते भी नहीं।
देखा भी तो सिर्फ हँसते हैं
और खेलते रहते हैं।
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मूल कविता: घड्याळबाबा
मूल कवि: कुसुमाग्रज
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपुर
शुक्रवार, जनवरी 26, 2007
सूरज उग आया था - सुरेश भट
सूरज उग आया था
इतना पता चला मुझको, जब चिता पर चढाया था
मौत छुडा ले गई है, ज़िंदगी ने सताया था।
पत्थरदिल ये दुनिया, कुछ कहने से ना बदली
शब्दों का चढावा मैने, खाम्खाह चढाया था।
जो बित गया वो सुखद अनुभव भूल जाते हैं
(क्या मौसम भी जिवन में, कभी लौट के आया था)
जब मैने सुनाई तुमको, मेरी वो प्रेम कहानी
तब मैने नाम तुम्हारा चुपचाप छुपाया था
इस बात का रोना है, के रोते ना बना हमसे
रंग तेरे खाबों का, आसूँओ में मिलाया था
सिर्फ तेरे यादों की मन में बौछार हुई थी
आभास तुम्हारा मैनें सीने से लगाया था
घर खोजने निकला मै, यहाँ वहाँ मै भटका
वो टुटा फुटा निकला जो दरवाजा पाया था
उस रात अकेला मैं जलता ही रहा आशा में
मै बूझ गया जब सुबहा का सूरज उग आया था
मूल कविता: आकाश उजळले होते
मूल कविः सुरेश भट
कविता संग्रहः एल्गार
भावानुवादः तुषार जोशी, नागपूर
इतना पता चला मुझको, जब चिता पर चढाया था
मौत छुडा ले गई है, ज़िंदगी ने सताया था।
पत्थरदिल ये दुनिया, कुछ कहने से ना बदली
शब्दों का चढावा मैने, खाम्खाह चढाया था।
जो बित गया वो सुखद अनुभव भूल जाते हैं
(क्या मौसम भी जिवन में, कभी लौट के आया था)
जब मैने सुनाई तुमको, मेरी वो प्रेम कहानी
तब मैने नाम तुम्हारा चुपचाप छुपाया था
इस बात का रोना है, के रोते ना बना हमसे
रंग तेरे खाबों का, आसूँओ में मिलाया था
सिर्फ तेरे यादों की मन में बौछार हुई थी
आभास तुम्हारा मैनें सीने से लगाया था
घर खोजने निकला मै, यहाँ वहाँ मै भटका
वो टुटा फुटा निकला जो दरवाजा पाया था
उस रात अकेला मैं जलता ही रहा आशा में
मै बूझ गया जब सुबहा का सूरज उग आया था
मूल कविता: आकाश उजळले होते
मूल कविः सुरेश भट
कविता संग्रहः एल्गार
भावानुवादः तुषार जोशी, नागपूर
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