गनपत लाला बीडी पीकर
लकडी कोई चबाता था
इसी जगह बंगला बांधूंगा
मनमे ही कहता रहता था
आँख मीच के दायी वाली
भौ उठाकर बायी तरफ से
जैसे बेसुर तान गवैया
फेंक देता लकडी वैसे
गि-हाइकीकों को ठीक से देता
जिरा धनीया गेहू चावल
तेल बेचना और बनाना
हिसाब उसको आता केवल
सपनों पर धुआँ छाता था
बिडी का कभी मोमबत्तीका
पढता था लेटा रहता था
तुलसीदास रामायण गाथा
दरी पुरानी और एक बोरा
सिरहाने में लेकर रहना
धी की बदबू लेते सोना
आता था बस उसको इतना
हड्डी पसली पीस पीस कर
लाला की जिंदगी बीती
दुकान की जमीन को वो ही
हड्डी हड्डी चुभती रहती
कितनी ही लकडीया लालाने
यही थी फेंकी चबा चबाकर
दुकान की जमीं को वो भी
चूभती रहती रह रह कर
गणपत लाला बिडी दिवाना
पिते पिते यूँ ही मर गया
एक माँगी तो दो का तोहफा
भगवान ने अंधे को दिया
मूल कविता: गणपत वाणी
कवि: बा. सी. मर्ढेकर
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपुर