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गुरुवार, मार्च 29, 2007

पल भर को साँसों का भर आना - संदीप खरे


सांग सख्या रे इस अल्बम मे से संदीप खरे और सलील कुलकर्णी का
एक बडा ही प्यारा गाना आज प्रस्तुत है।
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पल भर को सांसो का भर आना
और मेरे होठ कपकपा जाना
कैसा तेरा यादों में आना
तनन धीम त देरेना तेरेना
तनन धीम त देरेना तेरेना

हसना वो कपडों सा ही फिका फिका
मेरा ही रंग हो जाता था गहरा
सयानो सा ही बर्ताव तेरा होता था
दिवानो सा दिखता था मेरा चेहरा

पायल सन्नाटे में बजती है
कंगन की आहट खनकती है
फिर मेरा बावरा हुआ जाना
तनन धीम त देरेना तेरेना
तनन धीम त देरेना तेरेना

बातों के हजार मतलब निकालने मे
उलझा हुआ खोया था मै ऐसे
ना बोल गयी थी तुम यूँ उस दिन
कविता को मिलती है दाद जैसे

नींद खोके जागता ही रहता हूँ
रातों से भागता ही रहता हूँ
उफ तेरा खाबों में भी आना
तनन धीम त देरेना तेरेना
तनन धीम त देरेना तेरेना

सादगी के चिलमन के पिछे
रिश्ता नही, मौन ही तुमने जतन किया
शब्द ही नही मौन में भी अर्थ होता है
जीन्दगीके दिवाने पल को मालूम क्या ?

अपना भी रहता नही अब मै
अकेला ही रहता हूँ मै सब में
घूमते हुए हूँ ही खो जाना
तनन धीम त देरेना तेरेना
तनन धीम त देरेना तेरेना

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मूल कविता: लागते अनाम ओढ श्वासांना
कवि: संदीप खरे
संगीत: सलील कुळकर्णी
हिन्दी भावानुवाद: तुषार जोशी, नागपुर